केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा हाल ही में बिना प्रमाणपत्र या छूट वाली फ़िल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर की गयी घोषणा “सार्वजनिक” प्रदर्शन की परिभाषा और दर्शकों की सामूहिक तौर पर फ़िल्में देखने की आज़ादी से जुड़े ज़रूरी सवाल उठाती है।
17 सितम्बर को, छुपे हुए अन्दाज़ में धमकी देते हुए एक्स पर पोस्ट करते हुए सीबीएफ़सी ने कहा “किसी ऐसी दस्तावेज़ी (डॉक्यूमेंट्री) फ़िल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन जिसे सीबीएफ़सी द्वारा प्रमाणित नहीं किया गया है, सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम का उल्लंघन है बशर्ते इस अधिनियम के तहत कोई विशेष छूट नहीं हासिल की गयी हो”, इसके साथ ही इण्टरनैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्फ़ोर्मेशन टेक्नॉलॉजी – हैदराबाद के प्रशासन को “आवश्यक कार्रवाई हेतु ध्यान देने” के लिए टैग किया।
सीबीएफ़सी के बयान के बाद संस्थान ने 18 सितम्बर को तय दस्तावेज़ी फ़िल्म “प्रिजनर नंबर 626710 इज़ प्रेजेंट” की प्रदर्शनी पर इस आधार पर रोक लगा दी कि वह अनधिकृत थी। फ़िल्मकार ललित वचानी द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म छात्र कार्यकर्ता और शोधक उमर ख़ालिद के क़ैद पर आधारित है।
13 सितम्बर को बिना मुक़दमे के काले क़ानून ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत उमर ख़ालिद की क़ैद को छः साल पूरे हो गये। 21 सितम्बर 2026 को सुनवाई के लिए आयी उसकी ज़मानत याचिका को 30 सितम्बर 2026 तक के लिए टाल दिया गया। सरकार के लिए ख़ालिद का कोई ज़िक्र भी नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है और उसके साथ एकजुटता ज़ाहिर करते हुए नारे लगाने, यहाँ तक कि पोस्टर पकड़ने वाले कार्यकर्ताओं तक को पुलिस गिरफ़्तार कर लेती है।
ख़ालिद की गिरफ़्तारी की तारीख़ राजनीतिक क़ैदी दिवस के दिन पड़ती है जो भारत में हर साल भगतसिंह के साथी यतीन्द्र नाथ दास, जिनकी मौत 13 सितम्बर 1929 को जेल में भूख हड़ताल के 83वें दिन ब्रिटिश सरकार द्वारा जबरन खाना खिलाये जाने के बाद हुई थी, के शहीदी दिवस पर मनाया जाता है।
उमर ख़ालिद पर 2024 में बनी इस फ़िल्म का कई दफ़ा प्रदर्शन किया जा चुका है। इसके लिए सीबीएफ़सी से कोई प्रमाणपत्र नहीं माँगा गया था। वचानी ने वीडियो साझा करने वाली एक वेबसाइट पर अपनी फ़िल्म का लिंक साझा कर, इसमें दिलचस्पी रखने वाले किसी भी व्यक्ति या समूह के लिए इसकी स्क्रीनिंग निःशुल्क उपलब्ध करा दी है।
आईआईआईटी-हैदराबाद में फ़िल्म का प्रदर्शन रद्द होने से पहले मुम्बई और बंगलुरु में होने वाले फ़िल्म के प्रदर्शन रद्द किए गए थे। मुम्बई में सोश्ल मीडिया इंफ्लुएंसर्स सृष्टि खन्ना और प्रशांत पुनधिर को इस फ़िल्म के प्रदर्शन के लिए मुफ़ीद जगह नहीं मिल पायी। उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया कि पुलिस को एक वेन्यू कि जानकारी स्क्रीनिंग के एक दिन पहले मिल गयी और बान्द्रा के पश्चिमी इलाक़े में स्थित इस जगह के मालिक से उन्होंने पूछताछ की, जिसके बाद मालिक ने मना कर दिया। उन्होंने बताया की स्क्रीनिंग रद्द होने के बाद भी पुलिस ने वहाँ रेड मारना जारी रखा ताकि लोगों को डराया जा सके।
बेंगलुरु में, नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इण्डिया यूनिवर्सिटी की लॉ एण्ड सोसाइटी कमेटी द्वारा फ़िल्म की तय स्क्रीनिंग को “आपराधिक कार्रवाई, धमकी, डॉक्सिंग और अन्य तरीक़े से उत्पीड़न की गम्भीर धमकियों” के बाद रद्द कर दिया गया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार फ़िल्म की स्क्रीनिंग रद्द करने का फैसला विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र बार एसोसिएशन ने सीबीएफ़सी से प्रमाणपत्र प्राप्त न करने वाली फ़िल्म से जुड़े “क़ानूनी आवश्यकताओं” पर विचार करने के बाद लिया।
सीबीएफ़सी और सार्वजनिक फ़िल्म स्क्रीनिंग पर क़ानून
भारत में फ़िल्मों के सार्वजनिक स्क्रीनिंग के लिए प्रमाणन की व्यवस्था सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम, 1952 द्वारा नियंत्रित होती है। यह अधिनियम मूल रूप से औपनिवेशिक भारत में 1918 में मुख्यतः आग और सुरक्षा के कारणों से सार्वजनिक प्रदर्शन को विनियमित करने के लिए बनाया गया था। बाद में इसमें सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के आधार पर प्रतिबन्धों को भी शामिल किया गया और 1952 में इसे आज़ाद भारत में लागू रखा गया, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत निर्धारित सभी युक्तिसंगत प्रतिबन्ध भी शामिल थे।
फ़िल्म प्रमाणन सीबीएफ़सी द्वारा नियंत्रित किया जाता है जो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है और और यह कथित रूप से एक ‘स्वतंत्र’ निकाय है, जो फ़िल्मों की आयु-उपयुक्तता और विषय-वस्तु के आधार पर उनकी स्क्रीनिंग तथा प्रमाणन करता है। सीबीएफ़सी का तथाकथित उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है की फ़िल्म माध्यम समाज की गरिमा और स्तर के प्रति ज़िम्मेदार और संवेदनशील बना रहे; कि कलात्मक अभियक्ति और सर्जनात्मक आज़ादी पर अनावश्यक प्रतिबन्ध न हो; प्रमाणन सामाजिक बदलावों के अनुरूप हो और फ़िल्म साफ़ सुथरा और स्वस्थ मनोरंजन मुहैया कराए जो सौन्दर्यात्मक मूल्य और सिनेमा की दृष्टि से उच्च स्तर का हो।
बोर्ड यह भी सुनिश्चित करता है कि असामाजिक गतिविधियों या हिंसा के चित्रण का महिमामण्डन या औचित्य सिद्धि न हो, धूम्रपान या नशीले पदार्थों के सेवन को दर्शाने वाले दृश्यों के साथ वैधानिक चेतावनी दी जाए, और यौन हिंसा को दर्शाने वाले दृश्यों को कम से कम रखा जाए। (पूरी सूची के लिए फ़िल्म प्रमाणन सम्बन्धी नवीनतम संशोधित दिशानिर्देश पढ़ें)
सीबीएफ़सी अनधिकृत प्रदर्शन को रोकने के लिए सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम के प्रावधानों पर निर्भर है लेकिन धारा 6एबी किसी फ़िल्म का प्रदर्शन तब रोक सकती है यदि कॉपीराइट का उल्लंघन होता हो यानी जब जिसके पास फ़िल्म का कॉपीराइट है उसकी अनुमति के बिना किसी स्थान पर प्रदर्शित की जाये। साफ़ तौर पर, “अनधिकृत प्रदर्शन” का यह प्रावधान ऐसे फ़िल्म प्रदर्शन से सम्बन्धित है, जिसे कॉपीराइट धारक की अनुमति के बिना आयोजित किया गया हो और जिसे मुनाफ़े के मक़सद से (टिकट लेकर या शुल्क निर्धारित करके) स्क्रीन किया गया हो।
फिर क्या वजह है कि सीबीएफ़सी अपनी धौंस दिखाने और बिना प्रमाणन के सार्वजनिक स्क्रीनिंग रोकने के लिए धमकियाँ जारी कर रहा है? क्या उसे यह चिन्ता सता रही है कि इस तरह की स्क्रीनिंग्स फ़िल्मों के मुख्य “सेंसर” प्राधिकार की उसकी भूमिका को दरकिनार कर देंगे?
सीबीएफ़सी की भूमिका: प्रमाणन या सेंसरशिप?
सीबीएफ़सी के सभी सदस्य केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। पिछले कई सालों में सीबीएफ़सी बोर्ड में हुई नियुक्तियों का, ख़ासतौर पर अध्यक्ष पद पर, सिनेमा और कला से कम ताल्लुकात है और राजनीति से ज़्यादा। इसके मौजूदा अध्यक्ष शशि शेखर वेमपती एक मीडिया टेक्नोक्रैट हैं जिन्होंने इंफ़ोसिस में काम किया और जो दक्षिणपंथी न्यूज़ पोर्टल नीति सेण्ट्रल डॉट कॉम के सीईओ थे, और जिन्होंने 2014 के आम चुनावों में भाजपा का मीडिया अभियान मिशन 272+ चलाया था और प्रसार भर्ती के पूर्व सीईओ रह चुके हैं।
दिशानिर्देशों की आत्मपरक प्रकृति और सीबीएफ़सी के बढ़ते राजनीतिकरण को देखते हुए, बोर्ड द्वारा फ़िल्मों में कट्स या प्रमाणन से जुड़े फैसले भी इन प्रभावों से आज़ाद नहीं हैं। अपने पुराने और अधिक प्रचलित नाम (सेण्ट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सेंसर) के अनुरूप, इसने कई फ़िल्मों में ग़ैर वाजिब कट लगाये हैं और तुच्छ बहानों के आधार पर फ़िल्मों के प्रमाणन में देरी की है या उससे इनकार किया है, यहाँ तक कि तब भी, जब इन फ़िल्मों को मान्यता और प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले हों। इसके कई उदाहरण हैं।
पुलिस की बर्बरता और जातिगत हिंसा पर बनी पुरस्कार-विजेता फ़िल्म “संतोष” को भारत में दर्शकों के लिए उपलब्ध होने से रोक दिया गया है, इसी तरह, एक छोटी फ़िलिस्तीनी लड़की की हत्या पर बनी मार्मिक फ़िल्म “द वॉइस ऑफ़ हिंद रजाब” को भी शुरुआत में सीबीएफ़सी ने प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया गया था।
बोर्ड की अत्यधिक माँगों के कारण फीचर फ़िल्मों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, और फ़िल्म पंजाब 95 के लिए 120 कट की माँग इसका सटीक उदाहरण है। बाद में इस फ़िल्म को ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ज़ी5 पर “सतलुज” के नाम से रिलीज़ किया गया और तीन दिन बाद इसे वहाँ से भी हटा दिया गया।
यहाँ तक कि फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित की जाने वाली फ़िल्मों को प्रमाणन से दी जाने वाली छूट भी सेंसरशिप से आज़ाद नहीं है। केरल के इण्टरनेशनल डॉक्यूमेण्ट्री एण्ड शॉर्ट फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 31 फ़िल्मों को उनके “राजनीतिक विषय-वस्तु” के कारण प्रदर्शन के लिए छूट देने से इनकार कर दिया गया और हालाँकि इनमें से 23 फ़िल्मों को केरल हाई कोर्ट में सुनवाई की पूर्व संध्या पर केन्द्र सरकार से मंज़ूरी मिल गयी, लेकिन उन सफ़ाई कर्मचारियों की छँटनी पर आधारित फ़िल्म जिन्होंने कोविड महामारी के दौरान दिल्ली के एक अस्पताल में काम करने के बावजूद अपनी नौकरी खो दी थी “सैनिटाइज़्ड रिपब्लिक: कास्ट(ई) एण्ड कॉन्ट्रैक्ट्स” को मंज़ूरी नहीं मिली।
देश भर में फ़िल्म निर्माता सीबीएफ़सी के कट और बदलावों को उच्च न्यायालयों में चुनौती देते हैं। हालाँकि मौजूद आँकड़े बहुत ख़ास जानकारी नहीं देते, लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के एक सवाल के जवाब से कुछ जानकारी सामने आई: 2024-25 में प्रमाणन प्राप्त करने वाली 15,444 फ़िल्मों में से 3,033 में कट लगाये गये या उनमें बदलाव किये गये, जबकि दो फ़िल्मों को प्रमाणन देने से इनकार कर दिया गया। जहाँ 2024 में चार फ़िल्मों पर हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी, वहीं 2025 में कम-से-कम दस फ़िल्मों पर चुनौती दी गयी।
क्या क़ीमत, प्रमाणन?
दस्तावेज़ी फ़िल्मकार, जो ख़ुदमुख़्तार निगरानी दस्ते और राज्यसत्ता —दोनों की सेंसरशिप का ख़ामियाज़ा भुगतते हैं, ने प्रमाणन की इस तकलीफ़देह, लम्बी और अक्सर निष्फल प्रक्रिया से किनारा कर लिया है और इसके बजाय वे अपनी फ़िल्मों की स्क्रीनिंग निजी जगहों पर, सोशल मीडिया या ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर करने को तरजीह देते हैं।
जाने माने फ़िल्मकार आनन्द पटवर्धन ने एक लम्बी क़ानूनी लड़ाई के ज़रिये अपनी पुरस्कार-विजेता फ़िल्म “फ़ादर, सन एण्ड होली वॉर” को प्रसारित करने से इनकार करने के लिए राज्य से जवाबदेही तय करने की माँग की, लेकिन अन्य फ़िल्मकारों की तरह, उन्होंने भी अपनी बाद की फ़िल्मों के लिए प्रमाणन लेने से परहेज़ किया।
आज, भौतिक स्थान, चाहे वे कितने ही निजी हों, लगातार ना-महफ़ूज़ होते जा रहे। दक्षिणपंथी गुट हिंसा के दम पर, अक्सर पुलिस की नाक के नीचे, स्क्रीनिंग बाधित करते हैं और पुलिस क़ानून व्यवस्था बनाये रखने की अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है। जगह के मालिकों या संस्थान के प्रशासक को धमकाया और प्रताड़ित किया जाता है। पुलिस की दखलंदाज़ी और धमकी भरे सवालों का सामना करने के बाद, वे अक्सर आख़िरी समय में दबाव में आकर स्क्रीनिंग रद्द कर देते हैं।
जब अनुच्छेद 19 (1) (a) के तहत किसी फ़िल्मकार को फ़िल्म बनाने का अधिकार है, तो उसे अपने दर्शकों के सामने प्रदर्शित करने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए? बिना किसी मुनाफ़े पर या वाणिज्यिक उद्देश्य के, बिना टिकट वसूले कुछ ख़ास आमंत्रित दर्शकों के लिए किसी फ़िल्म की स्क्रीनिंग को सार्वजनिक प्रदर्शन के नाम पर क्यों रोका जाना चाहिए?
धमकियों के बावजूद, छोटे स्तर पर ही सही, इसका प्रतिरोध भी हो रहा है। मिसाल के तौर पर, एनएएलएसएआर हैदराबाद के छात्रों वचानी की फ़िल्म की स्क्रीनिंग से पीछे नहीं हटे। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लाट्फ़ोर्म्स सरकार की धमकियों के बावजूद फ़िल्म उपलब्ध करा रहे। हैं 2015-16 में कई बार स्क्र्निनिंग रोकी जाने के बाद नकुल सिंह साहनी की फ़िल्म “मुज़फ्फ़रनगर बाक़ी है” नेटफ़्लिक्स पर चली गयी पर भारत के दर्शकों के लिए मौजूद नहीं है।
आज जब फ़िल्म स्क्रीनिंग प्रदर्शन और प्रतिरोध के स्थलों में तब्दील हो रहे, सीबीएफ़सी की धमकी उस दुनिया को नज़रअंदाज़ करती है, जहाँ डिजिटल और एनालॉग माध्यम एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं। सार्वजनिक और निजी स्थानों के सह-अस्तित्व को देखते हुए, ऐसे फ़िल्म प्रदर्शनों पर सीबीएफ़सी की रोक के बारे में गम्भीरता से सोचे जाने की ज़रूरत है, जो एक जागरूक दर्शक-वर्ग के लिए ऐसे ‘मुनाफ़ा-रहित’ जगहों पर आयोजित किए जाते हैं, जहाँ आम जनता की सहज पहुँच नहीं होती।
जब बहुसंख्यकवादी राज्य में फ़िल्मों पर व्यापक सेंसरशिप पहले से ही एक स्थापित सच्चाई है, तब चर्चा, बहस या यहाँ तक कि असहमति को जन्म देने वाली फ़िल्मों को सामूहिक रूप से देखने की इच्छा रखने वाले चुनिन्दा दर्शकों को अपराधी ठहराना और दण्डित करना अभिव्यक्ति और विचार की स्वतंत्रता के अधिकार को और कमज़ोर करता है—और इसका दृढ़ता से मुक़ाबला किया जाना चाहिए।
(गीता सेषु का लेख फ्री स्पीच कलेक्टिव पर 27 सितंबर 2026 को प्रकाशित लेख। अनुवाद : वृषाली श्रुति। मूल अंग्रेज़ी लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)